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पोंगल पर्व

 

 पोंगल पर्व: दक्षिण भारत का सांस्कृतिक और कृषि उत्सव


परिचय

पोंगल दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु का सबसे महत्वपूर्ण और प्राचीन फसल उत्सव है। 'पोंगल' शब्द का शाब्दिक अर्थ है 'उबालना' या 'छलकना', जो जीवन में सुख, समृद्धि और प्रचुरता के आगमन का प्रतीक माना जाता है।

ऐतिहासिक तथ्य

इस पर्व का इतिहास लगभग 2,000 वर्ष पुराना है। संगम काल के साहित्य में इसे 'थाई निरातल' के रूप में वर्णित किया गया है। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में युवतियां कृषि की उन्नति के लिए उपवास रखती थीं और भगवान सूर्य की आराधना करती थीं।

पोंगल कब, कहाँ और क्यों मनाया जाता है ?

  • कब: यह पर्व प्रतिवर्ष मध्य जनवरी (14 से 17 जनवरी के बीच) में मनाया जाता है, जब सूर्य उत्तरायण होकर मकर राशि में प्रवेश करता है।
  • कहाँ: मुख्य रूप से तमिलनाडु, पुडुचेरी और श्रीलंका के तमिल समुदायों द्वारा मनाया जाता है।
  • क्यों: यह प्रकृति, सूर्य देव और कृषि में सहायक पशुओं के प्रति आभार प्रकट करने के लिए मनाया जाता है।

पोंगल पर्व का स्वरूप (इसे कैसे मनाते हैं?)

यह पर्व चार दिनों तक चलता है:

  1. भोगी पोंगल: पुरानी वस्तुओं को जलाकर स्वच्छता और नई शुरुआत का स्वागत किया जाता है।
  2. सूर्य पोंगल: मिट्टी के नए पात्र में नए चावल, दूध और गुड़ का 'पोंगल' बनाया जाता है और सूर्य देव को भोग लगाया जाता है।
  3. माट्टु पोंगल: कृषि कार्य में मदद करने वाले बैलों और गायों की पूजा की जाती है।
  4. कानुम पोंगल: इस दिन लोग अपने रिश्तेदारों से मिलते हैं और खुशियाँ बांटते हैं।

पोंगल पर्व के रोचक तथ्य

  • जब पोंगल का पात्र उफनता है, तो लोग "पोंगालो पोंगल!" का जयघोष करते हैं, जिसका अर्थ है "आपकी समृद्धि का भी इसी तरह विस्तार हो।"
  • इस दौरान घरों के सामने चावल के आटे से सुंदर 'कोलम' (रंगोली) बनाई जाती है।
  • माट्टु पोंगल के दिन साहसिक खेल 'जल्लीकट्टू' (सांडों को वश में करना) आयोजित किया जाता है।
जल्लीकट्टू 
जल्लीकट्टू का इतिहास अत्यंत प्राचीन और गौरवशाली है। यह केवल एक खेल नहीं, बल्कि तमिल संस्कृति और परंपरा का एक अटूट हिस्सा है। आइए इसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहलुओं को विस्तार से समझते हैं:

1. प्राचीन नाम और अर्थ

  • मूल नाम: प्राचीन काल में इसे 'एरु तझुवुथल' (Eru Thazhuvuthal) कहा जाता था, जिसका अर्थ है "सांड को गले लगाना"
  • नाम की उत्पत्ति: 'जल्लीकट्टू' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है— 'सल्ली' (सिक्के) और 'कट्टू' (पोटली)। पुराने समय में सांड के सींगों पर सिक्कों की पोटली बांधी जाती थी, जिसे साहस दिखाने वाला खिलाड़ी निकालता था। समय के साथ 'सल्ली' बदलकर 'जल्ली' हो गया।

2. ऐतिहासिक साक्ष्य (लगभग 2,000-2,500 वर्ष पुराना)

  • संगम साहित्य: तमिल संगम काल (3वीं शताब्दी ईसा पूर्व से 3वीं शताब्दी ईस्वी) के साहित्य, जैसे 'सिलप्पदिकारम' और 'कलित्थोगई' में इस खेल का विस्तृत वर्णन मिलता है।
  • पुरातात्विक प्रमाण: सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में मिली एक मुहर (Seal) पर एक व्यक्ति को सांड को वश में करते हुए दिखाया गया है, जिसे कई इतिहासकार जल्लीकट्टू का प्राचीन रूप मानते हैं।
  • शैल चित्र: तमिलनाडु के नीलगिरी और मदुरै के पास गुफाओं में ऐसे प्राचीन चित्र मिले हैं, जो दर्शाते हैं कि हज़ारों साल पहले भी मनुष्य और सांड के बीच इस तरह की प्रतियोगिता होती थी।

3. परंपरा और विवाह का संबंध

प्राचीन काल में यह साहस की परीक्षा का एक माध्यम था। ऐसी मान्यता थी कि जो युवक शक्तिशाली सांड को वश में कर लेता था, उसे अपनी बेटी का हाथ सौंपने के लिए कन्या पक्ष के लोग सहर्ष तैयार हो जाते थे। यह योद्धाओं के लिए अपनी वीरता सिद्ध करने का एक मंच था।

4. स्वदेशी नस्लों का संरक्षण

जल्लीकट्टू का एक महत्वपूर्ण पहलू 'कांगयम' (Kangayam) जैसी देशी सांडों की नस्लों को बचाना है।

  • इस खेल के लिए सबसे शक्तिशाली सांडों को चुना जाता है।
  • इन सांडों का उपयोग प्रजनन (breeding) के लिए किया जाता है, जिससे आने वाली नस्लें मजबूत होती हैं।
  • पशुपालक इन सांडों को अपने बच्चों की तरह पालते हैं और इन्हें 'मंदिर का सांड' मानकर सम्मान देते हैं।

5. आधुनिक काल और विवाद

आज यह खेल मुख्य रूप से मदुरै, तंजावुर और तिरुचिरापल्ली जिलों में माट्टु पोंगल के दिन आयोजित होता है।

  • नियम: खिलाड़ी को सांड के कूबड़ (Hump) को पकड़कर एक निश्चित दूरी तक या सांड के तीन छलांग लगाने तक टिके रहना होता है।
  • कानूनी संघर्ष: पशु क्रूरता के आरोपों के कारण 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन तमिल जनता के भारी विरोध और इसे सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा मानने के तर्क के बाद, 2017 में विशेष अध्यादेश के जरिए इसे पुनः शुरू किया गया।

निष्कर्ष: जल्लीकट्टू तमिलों के लिए केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि उनकी कृषि प्रधान संस्कृति, साहस और अपने पशुधन के प्रति प्रेम का प्रतीक है।

जल्लीकट्टू के लिए सांडों को तैयार करना किसी एथलीट की ट्रेनिंग जैसा होता है। यह एक लंबी और कठिन प्रक्रिया है जिसमें पशु के स्वास्थ्य और उसकी आक्रामकता दोनों का ध्यान रखा जाता है।

यहाँ जल्लीकट्टू के सांडों की तैयारी और नियमों का विस्तृत विवरण है:

1. सांडों की विशेष ट्रेनिंग (Preparation)

इन सांडों को जन्म से ही अन्य पशुओं की तुलना में अलग तरीके से पाला जाता है:

  • विशेष आहार: उन्हें खजूर, काजू, चने, कपास के बीज, बिनौला और चोकर का उच्च प्रोटीन वाला भोजन दिया जाता है। इससे सांड की मांसपेशियां मजबूत और शरीर फुर्तीला बनता है।
  • तैराकी (Swimming): सांडों को नियमित रूप से तालाबों में तैराया जाता है। यह उनके फेफड़ों की क्षमता बढ़ाने और पैरों को मजबूती देने के लिए सबसे अच्छी कसरत मानी जाती है।
  • मन्नू कुथल (Mannu Kuthal): सांडों को मिट्टी के ऊंचे ढेरों पर अपने सींगों से प्रहार करने का अभ्यास कराया जाता है। इससे उनकी गर्दन की मांसपेशियां और सींग शक्तिशाली बनते हैं, ताकि वे मैदान में खुद को बचा सकें।
  • अजनबी से दूरी: इन सांडों को मालिक के अलावा किसी और के संपर्क में कम आने दिया जाता है, ताकि खेल के दौरान वे मैदान में अजनबियों को देखकर अपनी रक्षा के लिए आक्रामक हो सकें।

2. खेल के मुख्य नियम (Rules of the Game)

जल्लीकट्टू के नियम बहुत कड़े होते हैं और अब इनकी निगरानी सीसीटीवी और प्रशासन द्वारा की जाती है:

  1. वाडि वासल (Vaadi Vaasal): यह वह संकीर्ण प्रवेश द्वार होता है जहाँ से सांड मैदान में प्रवेश करता है। सांड के बाहर आते ही खेल शुरू होता है।
  2. कूबड़ पकड़ना (Hump Holding): खिलाड़ी को केवल सांड के कूबड़ (Hump) को ही पकड़ना होता है। यदि कोई खिलाड़ी सांड की पूंछ, सींग या गर्दन पकड़ता है, तो उसे तुरंत अयोग्य घोषित कर दिया जाता है।
  3. जीत की शर्त: यदि कोई खिलाड़ी सांड के कूबड़ को पकड़कर एक निश्चित दूरी (लगभग 15-30 मीटर) तक या सांड के तीन छलांग लगाने तक टिका रहता है, तो वह विजेता माना जाता है। यदि कोई ऐसा नहीं कर पाता, तो सांड को विजेता घोषित किया जाता है।
  4. एक समय पर एक खिलाड़ी: नियम के अनुसार, एक सांड पर एक समय में केवल एक ही खिलाड़ी काबू पाने की कोशिश कर सकता है। सामूहिक रूप से सांड को घेरना मना है।
  5. पशु सुरक्षा: सांड को किसी भी प्रकार की चोट पहुंचाना, उसे डराना या नशीले पदार्थ देना सख्त वर्जित है। मैदान में जाने से पहले पशु चिकित्सकों द्वारा सांडों का मेडिकल टेस्ट किया जाता है।

रोचक पहलू: सांड और मालिक का रिश्ता

जल्लीकट्टू के सांड को परिवार का सदस्य माना जाता है। जब कोई सांड प्रतियोगिता जीतता है, तो उसका सम्मान पूरे गांव का सम्मान माना जाता है। कई बार मालिक सांड को इतना प्यार करते हैं कि वे उसे किसी भी कीमत पर बेचने को तैयार नहीं होते।

एक विशेष बात: खेल खत्म होने के बाद सांड को वापस उसके मालिक के पास छोड़ दिया जाता है। यदि सांड को कोई नहीं पकड़ पाता, तो इनाम (जैसे सोने के सिक्के, कपड़े या नकद राशि) सांड के मालिक को मिलता है।

2017 के बड़े जन-आंदोलन और कानूनी बदलावों के बाद, इसकी सुरक्षा व्यवस्था में भारी बदलाव किए गए हैं।

यहाँ आधुनिक जल्लीकट्टू में अपनाए गए प्रमुख सुरक्षा उपाय और बदलाव दिए गए हैं:

1. सांडों का अनिवार्य मेडिकल टेस्ट

मैदान में उतरने से पहले पशु चिकित्सकों की एक टीम हर सांड की जाँच करती है।

  • यह सुनिश्चित किया जाता है कि सांड को कोई नशीला पदार्थ, शराब या उत्तेजक दवा (Doping) न दी गई हो।
  • सांड की उम्र और स्वास्थ्य की जाँच की जाती है ताकि वह खेल के लिए फिट रहे।
  • आँखों में मिर्च पाउडर डालना या पूंछ को मरोड़ने जैसी क्रूरता अब पूरी तरह प्रतिबंधित है और पकड़े जाने पर मालिक पर आजीवन प्रतिबंध लग सकता है।

2. खिलाड़ियों के लिए कड़े मानक

  • पंजीकरण और पहचान: केवल पंजीकृत खिलाड़ियों को ही मैदान में जाने की अनुमति होती है। उन्हें एक विशिष्ट नंबर वाली टी-शर्ट दी जाती है।
  • स्वास्थ्य परीक्षण: खिलाड़ियों का ब्लड प्रेशर और फिटनेस टेस्ट किया जाता है। शराब के नशे में पाए जाने पर खिलाड़ी को तुरंत बाहर कर दिया जाता है।
  • बीमा (Insurance): अब कई आयोजनों में खिलाड़ियों के लिए जीवन बीमा का प्रावधान भी किया गया है।

3. मैदान और बुनियादी ढांचे में सुधार

  • डबल बैरिकेडिंग (Double Barricading): दर्शकों की सुरक्षा के लिए मैदान के चारों ओर दोहरी मजबूत घेराबंदी की जाती है, ताकि सांड भीड़ में न घुस सके।
  • नरम जमीन: सांड और खिलाड़ी के गिरने पर चोट न लगे, इसके लिए जमीन पर नारियल के छिलके (Coir Pith) की मोटी परत बिछाई जाती है, जिससे गिरने पर 'कुशन' जैसा प्रभाव मिलता है।
  • बड़ी स्क्रीन और गैलरी: दर्शकों के बैठने के लिए व्यवस्थित गैलरी बनाई जाती है ताकि वे सुरक्षित दूरी से खेल का आनंद ले सकें।

4. डिजिटल निगरानी (CCTV Monitoring)

  • पूरे खेल की वीडियोग्राफी और सीसीटीवी कैमरे से निगरानी की जाती है।
  • यदि कोई खिलाड़ी नियम तोड़ता है या सांड को चोट पहुँचाता है, तो वीडियो साक्ष्य के आधार पर उसे तुरंत अयोग्य घोषित कर दिया जाता है और कानूनी कार्रवाई की जाती है।

5. जिला प्रशासन की भूमिका

अब जल्लीकट्टू का आयोजन जिला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक की देखरेख में होता है। राज्य सरकार से अनुमति लेना अनिवार्य है, और आयोजन के दौरान एम्बुलेंस और पशु चिकित्सा मोबाइल वैन का मौके पर होना जरूरी है।

निष्कर्ष

इन बदलावों का मुख्य उद्देश्य "शून्य मृत्यु दर" (Zero Casualty) और "पशु कल्याण" सुनिश्चित करना है। अब यह खेल प्राचीन वीरता और आधुनिक सुरक्षा नियमों का एक अनूठा संगम बन गया है।

अलनगनल्लूर का जल्लीकट्टू विश्व प्रसिध्द है।   


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