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रविवार, 15 सितंबर 2013

मानसून और किसान

मानसून और किसान 

मानसून को भी क्या कहें
वह शहर में बरसता है।
गाँव का किसान
एक बूँद पानी को तरसता है । ।
प्यासी धरती , भूखा किसान।
कैसे उपजाए गेंहू और धान ॥ 
सूख रहे खेतों में अनाज के पौधे
अगर कुछ नहीं सूखा , वह है किसानों का पसीना ।
भूखे बैल नाधे, हल चलाते,
किसान की मिट रही पहचान ।
मेघों की आँख मिचौली से ,
टूट गए उसके अरमान ।
अषाढ़ के आते वह बीज बोता ,
पानी न बरसने पर अपने किस्मत को रोता ।
बीते साल की तरह ,
मानसून उसे धोखा दिया है ।
आशा के दीप जला कर उसे कंगाल किया है।
वसुंधरा और किसान का नाता ,
शायद मानसून को नही भाता ।
नहीं , वह जरुर आता ,
उसे और उसकी धरती को नहलाता ।
प्यासी धरती और भूखा किसान ।
कैसे उपजाए वह गेहूँ और धान ॥

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